कुतुब मीनार की लंबाई कितनी है ? | Qutub Minar Ki Lambai Kitni Hai ?

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कुतुब मीनार का इतिहास ( कुतुब मीनार की लंबाई कितनी है )

कुतुबमीनार ईटों की बनी विश्व की सबसे ऊंची मीनारों में से एक है | जिसकी ऊंचाई 72.5 मीटर यानी 237.86 है | यह मीनार दक्षिणी दिल्ली के महरौली में स्थित है | कुतुब मीनार एक पांच मंजिला मीनार है| जिसमें बालकनियाँ बनी हुई है | जिनका व्यास लगभग 15 मीटर है | यह जमीन से 2.5 मीटर ऊंची है | कुतुब मीनार की खास बात यह है , कि इसकी पहली तीन मंजिले लाल रंग की रेतीली पत्थरों से बनी है, तथा चौथी और पांचवी मंजिल मार्बल और रेतीले पत्थरों से बनी हुई हैं | यदि हम इस इमारत के नीचे के हिस्से की बात करें , तो यहां पर कोवव्त ए उल इस्लाम मस्जिद है | जो कि भारत में बनाई गई पहली मस्जिद थी। इस मीनार की पूर्व दिशा में बने दरवाजे पर यह लिखा गया है, कि इस मीनार को 27 हिंदू मंदिरों को पूरी तरीके से बर्बाद करने के बाद प्राप्त सामग्री से बनाया गया है | इसके अलावा कुतुब मीनार के बीचो बीच एक 7 मीटर ऊंचा लोहे का खंबा भी मौजूद है | ऐसा माना जाता है कि यदि आप इस खंभे को घेर कर अपने दोनों हाथों से पकड़ लेंगे तो आपकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी।

कुतुब मीनार का निर्माण दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा 13वीं शताब्दी में शुरू करवाया गया था | लेकिन जब केवल इस इमारत की नींव रखी गई थी , तभी कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई थी | इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक के दास और दामाद इल्तुतमिश ने इसमें और तीन मंजिल इमारतों को बढ़ाया | इसके बाद इसकी चौथी मंजिल फिरोजशाह तुगलक द्वारा बनवाया गया | कुतुब मीनार का निर्माण लाल रंग की बलुआ पत्थरों से करवाया गया है | जिस पर कुरान की आयतों और फूल पत्तियों की महीन कारीगरी की गई है |

कुतुब मीनार के परिसर में और भी बहुत से स्मारक बनवाए गए हैं |  जिन्हें अलाई दरवाजा, कुवत उल इस्लाम मस्जिद , अल्तमश अलाउद्दीन खिलजी और इमाम जमीन का मकबरा, अलाई मीनार भी शामिल है।

जब आप कुतुबमीनार को ध्यान से देखेंगे तो आपको प्रतीत होगा कि इसके सभी मंजिल के चारों तरफ बालकनियों बनी हुई है, जो इस मीनार को घेर कर रखती हैं | इसके अलावा इस इमारत को सहारा देने के लिए लोहे की ब्रैकेट का इस्तेमाल किया गया है, जो देखने में मधुमक्खी के छत्ते के समान दिखाई देती है।

कुतुब मीनार के उत्तर पूर्व में कुवत उल इस्लाम मस्जिद है | इस मस्जिद का निर्माण भी 1198 में कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा ही करवाया गया था | ऐसा माना जाता है कि दिल्ली के सुल्तानों द्वारा बनाई गई सबसे पुरानी मस्जिद है | मस्जिदों तथा मीनारों की खासियत यह है, कि यह सभी इमारतें एक आयत कार आंगन में बने हुए हैं | इनके भीतर 27 हिंदू तथा जैन मंदिरों के वास्तु कला के नमूने भी शामिल है | जिन्हें कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली पर हमला करके नष्ट कर दिया था और इन्हीं ध्वस्त मंदिरों के ऊपर कुतुब मीनार की नींव रखी गई थी और इस मीनार के साथ ही एक बड़ा सा मस्जिद बनवाया गया था | इसके बाद कुतुब मीनार का निर्माण कार्य इल्तुतमिश द्वारा सन 1210 से 1235 तक करवाया गया और इसके बाद इसे अलाउद्दीन खिलजी द्वारा पूरा किया गया |

सन 1211 से 1136 तक इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद 1235 में इसका मकबरा बनवाया गया, जिसका निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से चकोर कक्ष के रूप में करवाया गया और इस मकबरे पर बहुत सारे शिलालेख ज्यामिति आकृतियां और कुछ अरबी नमूने भरे गए हैं |

कुतुब मीनार के उत्तर में अलाई मीनार खड़ी है | जिसका निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने शुरू कराया था ,और वह इस मीनार को कुतुब मीनार से भी ऊंचा बनवाना चाहता था, लेकिन यह मीनार केवल 25 मीटर तक ही बन सकी | इसके बाद उसकी भी मृत्यु हो गई कुतुब मीनार के इस हिस्से में भी आपको मदरसे कब्रगाह ए मकबरे मस्जिद जैसे इमारतों के अवशेष प्राप्त हो जाएंगे।

कुतुबमीनार को यूनेस्को के द्वारा सबसे ऊंची ईटों की मीनार के रूप में विरासत घोषित किया है।

कुतुब मीनार जब से लोगों की नजरों में आई है, तब से यह विवादों में ही गिरी हुई है | कुछ लोगों का मानना है कि भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत का जश्न मनाने के लिए कुतुब मीनार का निर्माण करवाया गया था | इसके अलावा क्योंकि कुतुबमीनार के नीचे एक मस्जिद भी है | ऐसा भी माना जाता है कि मुस्लिम यहां पर अपनी नमाज अदा करने के लिए आते थे | कुतुब मीनार के सबसे खास बात यह है कि यह दुनिया की बेहतरीन इमारतों में से एक है | कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे तुगलक स्थापत्य शैली के संयोजन से इसका निर्माण कार्य कराया था । कुछ लोग मानते हैं कि जब कुतुबमीनार की तीसरी मंजिल पर आग लग गई थी, तो इसका निर्माण फिरोजशाह तुगलक ने दोबारा करवाया था।

कुतुबमीनार का नाम कैसे पड़ा ?

कुतुबमीनार दुनिया की सबसे ऊंची ईंटों से बनी इमारत है | इस इमारत की नींव कुतुबुद्दीन ऐबक उन्हें रखी थी जिसके बाद में मृत्यु हो गई थी | फिर इस इमारत का निर्माण इल्तुतमिश जो कि एक मुस्लिम दास शासक था ने आगे बढ़ाया और उसकी भी मृत्यु के बाद इस इमारत की चौथी और पांचवी मंजिल का निर्माण करवाया |  फिर उसने पूर्ण कराया कुतुबमीनार का नाम कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर रखा गया क्योंकि कुतुब मीनार की नींव कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा ही शुरू किया गया था ।

कुतुबमीनार को विजय स्तंभ भी कहा जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है, कि भारत में प्रथम आए मुस्लिमों की जीत के जश्न को यादगार बनाने के लिए इसे बनवाया गया था | दिल्ली में तथा भारत में यह मशहूर पर्यटन स्थल है , तथा भारत और विश्व के कोने-कोने से लोग यहां पर घूमने आते हैं।

कुतुब मीनार की लंबाई कितनी है ?

कुतुब मीनार दिल्ली का मशहूर पर्यटन स्थल है, तथा इसे लाल बलुआ पत्थरों से बनवाया गया है | इसकी चौथी और पांचवी मंजिल संगमरमर और सफेद बलुआ पत्थरों से बनवाई गई है | इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने शुरू कराया था और इल्तुतमिश तथा खिलजी ने इसके निर्माण को पूरा कराया था | इस इमारत की ऊंचाई 72.5 मीटर यानी 237.86 फीट है | इसे दुनिया की सबसे ऊंची मीनार की उपलब्धि हासिल है | कुतुबमीनार को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया गया है ।

कुतुबमीनार की लंबाई / ऊंचाई कितनी है

कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाई गई है मीनार दुनिया की सबसे ऊंची ईंटों के द्वारा बनाए गए मीनार है | इसकी ऊंचाई 73 मीटर के करीब है | यदि हम फीट की बात करें तो इसकी ऊंचाई 237.86 फीट ऊंची है | लाल बलुआ पत्थर से बने यह इमारत यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में दुनिया भर के स्मारक सूची में शामिल किया गया है | भारत में क़ुतुब मीनार पर्यटकों का सबसे पसंदीदा पर्यटन स्थल है | क़ुतुब मीनार के परिसर में कुतुब मीनार के अलावा बहुत सारे मस्जिद मकबरे  इत्यादि भी शामिल है |

कुतुब मीनार की लंबाई चौड़ाई और परिमाप के बारे में बताइए

दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है, जो ईटों से बनी हुई है | इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक में 11वीं शताब्दी के अंत में करवाया था  | जब कुतुबुद्दीन ऐबक ने इमारत की नींव रखी उसके बाद उसकी मृत्यु हो गई थी फिर अगले दशक से तीसरी मंजिल तक बनवाया तथा चौथी और पांचवी मंजिल का निर्माण दो अन्य मुस्लिम शासक ने करवाया था | इस इमारत में पांच अलग-अलग मंजिल है | प्रथम तीन ताल लाल बलुआ पत्थर के बने हैं , जबकि चौथी और पांचवी मंजिल संगमरमर और बलूवा पत्थर से मिलकर के बनी है | इस इमारत के चारों तरफ प्रत्येक तल पर बालकनी या बनाई गई हैं | इस इमारत के नीचे हिस्से में भारत की पहली मस्जिद कुवत उल इस्लाम है | इस इमारत का व्यास 15 मीटर है | यह शीर्ष से लेकर अंतिम छोर तक 2.5 मीटर तक मापी गई है।

कुतुब मीनार को किसने बनवाया था ?

यूनेस्को द्वारा दिल्ली की खूबसूरत इमारत को विश्व के ऐतिहासिक इमारतों में शामिल किया गया ,  जिसका नाम कुतुब मीनार है | कुतुब मीनार को भारत के दिल्ली शहर पर हमला वह मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाना शुरू किया था ऐसा माना जाता है,  कि जब कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली पर हमला किया तो मुस्लिम शासकों की जीत को ऐतिहासिक बनाने के लिए उसने इस मीनार का निर्माण करवाया था | इसीलिए इस इमारत को हम कुतुब मीनार के नाम से जानते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश कुतुबमीनार ने जैसे ही इस इमारत का निर्माण शुरू कराया था उसकी मृत्यु हो गई थी | बाद में इसे इल्तुतमिश द्वारा तीसरी मंजिल तक पूरा कराया गया और चौथी और पांचवी मंजिल इसके बाद ही बनाई गई |  लाल बलुआ पत्थरों से बना क़ुतुब मीनार विश्व धरोहरों में शामिल है, क्योंकि देखने में यह बहुत अनूठा है इस पर की गई तुर्की नक्काशी देखते ही बनती है यह इतिहास और कला का अनूठा नमूना है ,जिसे देखने के लिए दुनिया भर के पर्यटक भारत आते हैं |

कुतुब मीनार को क्यों बनवाया गया था ?

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि क़ुतुब मीनार कुतुबुद्दीन ऐबक के सूफी गुरु संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार के नाम पर बनाया गया था | लेकिन वास्तविक तौर पर जब कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली पर आक्रमण किया था, तो मुस्लिम शासकों की जीत का जश्न यादगार बनाने के लिए उसने 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर बनवाया था | इसे मुस्लिम शासकों की जीत का प्रतीक माना जाता है |

इसके अलावा कुछ इतिहास वक्ता यह भी मानते हैं, कि इस्लाम के यह शासन मंगोल साम्राज्य से बचकर भारत आ गए थे जहां पर उन्होंने अपने इस्लामिक धार्मिक केंद्रों का निर्माण कराना शुरू कर दिया था और कुतुबमीनार भी ऐसे ही इस्लामिक समुदायों के लिए एक संगठन के रूप में कार्य करता था और भारत में इस्लाम के उपस्थिति की याद दिलाता था | इस मीनार का निर्माण विशिष्ट शैली और अरबी शैली की कृतियों से किया गया है | इसकी संरचना में कहीं-कहीं भारतीय मंदिरों की झलक भी दिखाई दी दे जाती है, तथा जब इस मीनार का निर्माण हो रहा था तो इस में काम करने वाले मजदूर मजदूर हिंदू थे लेकिन इसकी देखरेख मुस्लिम वास्तु कारों द्वारा ही की गई थी | इसीलिए इसे हिंदू मुस्लिम वास्तु कला का अनूठा नमूना माना जाता है, तथा इस मीनार पर कहीं-कहीं कुरान ग्रंथ की अभिव्यक्ति आ भी उकेरी गई हैं ।

अब हम आपको कुतुब मीनार के परिसर के अन्य इमारतों के बारे में बताने जा रहे हैं

लौह स्तंभ

कुतुबमीनार दुनिया भर के मशहूर पर्यटन स्थलों में से एक है, इसे यूनेस्को द्वारा विश्व ऐतिहासिक स्मारक की सूची में शामिल किया गया है | इस परिसर में एक 7 फीट लंबा लोहे का स्तंभ भी लगा हुआ है | ऐसा माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने पीछे से लौह स्तंभ को अपने दोनों हाथों से पकड़ लेता है, तो उसकी हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है । अंग्रेजी में इसे आईरन पिलर के नाम से जाना जाता है ।

 इतिहासकारों के अनुसार यह लो स्तंभ धातु कर्म के प्राचीन भारतीय कला का नमूना है, जिसका निर्माण राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने कराया था | इसकी ऊंचाई 7 मीटर है | इसे पहले हिंदू और जैन धर्म के मंदिरों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था  | लेकिन जब कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़ा तथा उनसे जो भी बहुमूल्य चीज है उसे प्राप्त हुई उसे उसने कुतुबमीनार के परिसर में लगवा दिया | यह स्तंभ भी उन्हीं जैन और हिंदू मंदिरों से लूटा गया था | आज तक इस स्तंभ में किसी भी प्रकार का जंग नहीं लगा है |  इस पर मौसम का कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा है |

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह सब लगभग चौथी सदी में बनाया गया था इस स्थान पर संस्कृत में कुछ लिखावट की गई है, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।

इतिहासकारों की मानें तो राजा चंद्रगुप्त द्वारा मथुरा में विष्णु पहाड़ी के पास भगवान विष्णु के मंदिर के सामने इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था |  जिस पर गरुड़ को स्थापित किया गया था | इसीलिए इस स्तंभ को कहीं-कहीं गरुड़ स्तंभ के नाम से भी जाना जाता है | दिल्ली में यह स्तंभ दिल्ली के संस्थापक अनंगपाल द्वारा लाया गया था |

कुतुब मीनार परिसर में स्थित 7 मीटर ऊंचा स्तम्भ है, तथा इसे पत्थर के प्लेटफार्म के बीचो-बीच लगाया गया है | इसके ऊपर पहले कभी कोई मूर्ति स्थापित की गई होगी बाद में वैज्ञानिकों ने इस पर कई रासायनिक परीक्षण भी किए जिससे यह पता चला कि यह लो स्तंभ शुद्ध इस्पात से बना हुआ है | इसमें आज के पाए जाने वाले पौधों के में कार्बन की मात्रा काफी कम है |  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रसायन शास्त्री डॉ बीवी लाल ने बताया कि इस स्तंभ का निर्माण गर्म लोहे के बीच 30 किलो के टुकड़ों को जोड़ने से हुआ है | इसे लगभग 120 कारीगरों ने दिन-रात परिश्रम के बाद बनाया होगा और इसे आज से 16 वर्ष पूर्व गर्म लोहे के टुकड़ों को जोड़ने की तकनीक का आश्चर्यजनक उदाहरण भी कहा जा सकता है , क्योंकि इतने बड़े लो स्तंभ में कहीं पर भी जोड़ का कोई भी निशान नहीं दिखाई देता है | लगभग 16 शताब्दियों से खुले में रहने के बावजूद भी इस पर आज तक किसी भी प्रकार का कोई भी जंग नहीं लगा है, और ना ही लोहा होने के बावजूद इस पर सल्फर और मैग्नीज की अधिकतम मात्रा पाई गई है | यदि हम रसायन शास्त्र की माने तो  अधिक मात्रा होने के कारण लोहे पर जंग नहीं लगता है, इसके अलावा इस पर ऑक्साइड की परत भी चढ़ी हुई है, जो इसे निरंतर जंग से बचाए हुए रखती है।

लोह स्तंभ के बारे में अलग-अलग इतिहासकारों की अलग-अलग राय है | कुछ लोग इसे चंद्रगुप्त द्वितीय के काल से जोड़ते हैं  | कुछ इतिहासकार इसे गुप्त शैली का मानते हैं | इसके अलावा जेम्स से गुलशन जैसे द्वारा इसे सम्राट अशोक का स्तंभ भी कहा जाता है | जिसने उसे अपने दादा चंद्रगुप्त मौर्य की याद में बनवाया था।

लोह स्तंभ पर बहुत सारे लेख और भित्ति चित्र भी उपलब्ध हैं, जिस पर अलग-अलग तिथियों का वर्णन किया गया है, लेकिन अभी भी इस पर लिखा गया बहुत सा हिस्सा ऐसा है, जिसका अभी तक पूर्ण रूप से अध्ययन नहीं किया गया है | इस लोह स्तंभ पर लिखे गए लेख की लंबाई 33.5 इंच और चौड़ाई 10.5 इंच इस स्तंभ पर पूरी तरह से संरक्षित है, क्योंकि यह स्तंभ जंग प्रतिरोधी है ।

अलाई दरवाजा

अलाई दरवाजा कुतुब मीनार परिसर महरौली दिल्ली में स्थित प्रथम मस्जिद कुवत उल इस्लाम का दक्षिणी प्रवेश द्वार है |  सन 1311 में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी द्वारा इसे लाल बलुआ पत्थरों से बनाया गया था | यह एक चकोर गुम बंद वाला दरवाजा है, जिसके बाहर मेहराब दार प्रवेश द्वार बनाया गया है और इसमें केवल एक ही कमरा उपलब्ध है।

कुतुब मीनार के अलावा अलाई दरवाजे को भी यूनेस्को ने विश्व ऐतिहासिक धरोहर में शामिल किया है | तथा इसे भारत इस्लामी वास्तुकला का विशेष उदाहरण माना जाता है, इसका निर्माण और सजावट का तरीका भारतीय इस्लामी वास्तुकला का अनूठा उदाहरण है।

अलाई दरवाजा अलाउद्दीन खिलजी जो कि खिलजी वंश का उत्तराधिकारी था ने इसे चार हिस्सों में बनाने की सोची थी, लेकिन केवल अलाई दरवाजा ही पूरा हो सका  | इसके बाद सन 1316 में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई थी और यह कुवत उल इस्लाम मस्जिद के दक्षिणी प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है | जब आप कुतुब मीनार देखने जाएंगे तो आप दक्षिण दिशा में इस एक कमरे की बनी हुई इमारत को देख सकते हैं  | 1993 में इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल के नाम से संरक्षित कर दिया है |

यदि हम अलाइ दरवाजे की वास्तुकला की बात करें तो इसके अंदर का भाग लगभग 34.5 फीट यानी 10.5 मीटर है ,और बाहरी भाग 56.5 फीट यानी 17.2 मीटर का है यह दरवाजा 60 फीट लंबा है, तथा इसकी दीवारें 3.8 मीटर मोटी है |

इसकी बनावट ऐसी है कि देखने वाले दांतो तले उंगलियां दबा लेते हैं | यह एक प्रकार का मोटी दीवारों का पुतला गुंबद है | जो केवल एक निश्चित दूरी से ही दिखाई देता है | लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से बना यह इमारत पारस और मध्य एशिया की वास्तुकला का परिचय देता है | इसके नुकीले मेहरा अपने आधार से एक साथ सामने की तरफ दिखाई देते हैं | इस पर हल्के घोड़े की नाल का मेहराब बना हुआ है | इसे किसी भी तरीके से पुच्छल नहीं कहा जा सकता है | इस पर कमल की कलियों की बारीक कृतियां भी उकेरी गई है | आजकल यही नेट स्टोर, ओपन वर्क, भारतीय मंदिरों पर उपयोग किए जा रहे हैं |

अलाई दरवाजा की गुंबद की ऊंचाई 14 मीटर यानी 47 फीट है | भारत में निर्मित यह पहला गुंबद है, इसके बाद के बनाए गए सभी गुंबद सफल नहीं रहे , क्योंकि वह सभी भी लाल बलुआ पत्थर से ही बने हुए थे अलाई दरवाजा की भीतरी दीवारें सफेद रंग के पत्थरों से बनाई गई है | अली दरवाजे की दीवारों पर अरबी में आयाते लिखी गई है | खिड़कियों में संगमरमर की जाली लगी हुई है।

अलाई मीनार

क़ुतुब मीनार के परिसर में बहुत सारे स्मारक और इमारतें बनाई गई हैं | यह दिल्ली के महरौली में स्थित है तथा कुतुबमीनार को मुस्लिम शासकों की प्रथम जीत की याद में मनाया गया था | जिसे जीत  टावर के नाम से भी जाना जाता है |

कुतुबुद्दीन ऐबक सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार का चेला था और इसने कुतुबुद्दीन के नाम से ही इस मीनार की नींव रखी थी | लेकिन वह इसे पूरा नहीं करा सका इसके बाद उसका उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसके निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया, परंतु दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु हो गई और अंत में दिल्ली के शासक सुल्तान फिरोज़ शाह तुगलक द्वारा इसकी चौथी और पांचवी मंजिल का निर्माण कार्य पूरा कराया गया |

बाद में कुतुब मीनार के परिसर में तुगलक अलाउद्दीन खिलजी और अंग्रेजों के बाद कई सारे शासकों ने इसमें और भी अधिक निर्माण कार्य कराए , तथा कुतुब मीनार परिसर में कुवत उल इस्लाम मस्जिद अलाई दरवाजा अलाई मीनार जैसी  मुख्य संरचनाएं आपको देखने को मिल जाएंगे।

कुतुब मीनार परिसर में आपको इल्तुतमिश और अलाउद्दीन खिलजी की कब्रे भी देखने को मिल सकती हैं |

अलाई दरवाजा कुवत उल इस्लाम यानी भारत के पहले मस्जिद का दक्षिणी सिरे का एक मुख्य प्रवेश द्वार है जिसे दूसरे खिलजी सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने एक प्रवेश द्वार के रूप में बनवाया था | इसका निर्माण भी लाल बलुआ पत्थरों से किया गया है । इसे भी इस्लामी और भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है।

1310 में बना द्वार

1310 में कुतुब मीनार परिसर में बहुत सारे निर्माण कार्य कराए गए, जिसमें अलाई दरवाजा का निर्माण कराया गया | यह दरवाजा कुवत उल इस्लाम भारत के पहले मस्जिद के द्वार के रूप में बनवाया गया है | यह दरवाजा दक्षिण दिशा में स्थित है | जिसे कुवत उल इस्लाम मस्जिद का दक्षिणी द्वार कहा जाता है | 1310 में इसका निर्माण खिलजी द्वारा करवाया गया था | जिसका पूरा नाम अलाउद्दीन खिलजी था और वह खिलजी वंश का उत्तराधिकारी था |

 शुरू में उसने इसके चार द्वार बनाने की सोची थी लेकिन पहले ही द्वार के निर्माण के बाद यानी अलाई दरवाजे के निर्माण के बाद ही उसकी मृत्यु हो गई |  बाद में किसी भी शासक ने इसके अन्य द्वारों का निर्माण नहीं कराया गया है |  यूनेस्को द्वारा इसे कुतुब मीनार परिसर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल किया है | जिसे अब पूर्ण रूप से दिल्ली सरकार के द्वारा अथवा केंद्र सरकार के द्वारा संरक्षित किया जा रहा है 1310 में निर्माणाधीन यह दरवाजा भारतीय और इस्लामी वास्तुकला का अनोखा उदाहरण है, क्योंकि इस पर हिंदू मंदिरों के निर्माण की झलक और इस्लामी परंपरा की झलक भी आपको देखने को मिल जाएगी | गुंबद दार बना यह दरवाजा लगभग 42 फीट ऊंचा है तथा इसे लाल बलुआ पत्थरों से बनवाया गया है | इसकी दीवारों में संगमरमर की बनी हुई खिड़कियां लगाई गई है ,तथा एक कक्ष की बनी यह इमारत वास्तु कला का एक अनोखा उदाहरण है | दुनिया भर से इसे देखने के लिए लोग आते हैं |

अल्तमश कौन था

शमसुद्दीन अल्तमश दिल्ली सल्तनत का वंश का उत्तराधिकारी था | जिसने भारत में तुर्की राज्य संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद शासन किया था | उसने दिल्ली में मुसलमानों के सल्तनत को मजबूत किया था और यह कुतुबुद्दीन ऐबक का दामाद भी था | सन 1211 से लेकर 1236 तक इसने दिल्ली में शासन किया लेकिन उसके राज्य अभिषेक से ही तुर्क के अमीर शासक उसका विरोध कर रहे थे |

 इल्तुतमिश की कार्यकुशलता से प्रभावित होकर मोहम्मद गौरी ने उसे अमीरुल उमरा के नाम की उपाधि दी थी | कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के कारण तुर्क के कुछ अधिकारियों ने कुतुबुद्दीन ऐबक के दामाद को जो कि उस समय बदायूं का सरदार था | दिल्ली के राज सिंहासन पर बैठा दिया गया था इसके बाद आराम शाह और इल्तुतमिश के बीच में दिल्ली के पास बहुत बड़ा संघर्ष हुआ था , जिसमें इल्तुतमिश ने आराम साहब को बंदी बनाकर उसकी हत्या कर दी थी |

इल्तुतमिश के द्वारा ही कुतुबुद्दीन ऐबक के बनाए गए स्मारकों को पूर्ण करवाया गया तथा उसने कुतुबुद्दीन ऐबक की इमारत बनाने की परंपरा को आगे बनाए रखा, और कुतुब मीनार परिसर में अन्य मीनारों का निर्माण भी कराया तथा कुतुबमीनार का भी निर्माण तीसरी मंजिल तक पूरा कराया।।

इल्तुतमिश को प्रथम बुद्धिमान और मूर्ख शासक कहां गया है ,क्योंकि इसने पहले शुद्ध अरबी के सिक्के चलवाये थे और फिर बाद में इसने अचानक से चांदी के सिक्के चलवा दिए और इसके बाद उसने तांबे के सिक्कों का प्रचलन भी शुरू कर दिया था | इल्तुतमिश को बुद्धिमान शासक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह बदलाव में विश्वास रखता था | लेकिन उसके द्वारा बनाए गए नियमों को वह स्वयं संचालित नहीं कर पाता था इसीलिए उसके द्वारा शुरू किए गए सभी अच्छे कार्य बाद में मूर्खतापूर्ण साबित होते थे | इल्तुतमिश ने ही एकता व्यवस्था का प्रचलन किया था और अपनी राजधानी लाहौर को दिल्ली लाकर के स्थानांतरित कर दिया था।

बाद में इल्तुतमिश को एक गंभीर बीमारी हो गई थी और 30 अप्रैल 1236 को इसकी मृत्यु हो गई थी इल्तुतमिश को आर्थिक सुधारों का असरदार भी कहा जाता है। इल्तुतमिश ने बहुत सारे अच्छे कार्य भी करवाए थे |

  • किसी पराई औरत को गलत नजरों से नहीं देखना चाहिए |
  • व्यक्ति को एक भी नमाज छोड़नी नहीं चाहिए |
  • इस्लामी व्यक्ति का दिल नेक और साफ होना चाहिए |
  • इस्लामिक शरिया कानून के अनुसार एक मुसलमान व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना |
  • इसके अलावा एक मुसलमान को हमेशा अपने हक के रास्ते पर ही चलना चाहिए।

अलाउद्दीन खिलजी तथा इमाम जामिन के मकबरे

इतिहासकारों का मानना है कि अफगानिस्तान में स्थित जाम की मीनार से प्रेरित होकर के दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे 11वीं शताब्दी के अंत में बनवाना शुरू किया था | जिसे आज हम कुतुब मीनार के नाम से जानते हैं |  बाद में उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसे अन्य तीन मंजिलों तक बनवाया तथा फिरोजशाह तुगलक द्वारा पांचवी और आखरी मंजिल बनवाई गई | कुतुबमीनार को लाल बलुआ पत्थरों और सफेद संगमरमर से बनवाया गया है, तथा इसकी हर मंजिल पर कुरान की आयतों को उकेरा गया है | कुतुब मीनार परिसर में अन्य बहुत सारे स्मारक भी हैं, जिसमें अलाई दरवाजा कुवत उल इस्लाम मस्जिद अल्तमश अलाउद्दीन खिलजी तथा इमाम जामिन के मकबरे भी स्थित हैं | इसके अलावा कुतुब मीनार परिसर में 7 मीटर ऊंचा लोहे का स्तंभ भी है |

अलाउद्दीन खिलजी खिलजी वंश का दूसरा शासक था | अपना साम्राज्य स्थापित किया था अफगानिस्तान से लेकर के उत्तर मध्य भारत तक अपना शासन फैलाया और अपने शासन को इतना मजबूत बना लिया कि आगे 300 सालों तक कोई भी शासक वंश को हिला नहीं पाया | कुतुब मीनार परिसर में स्थित अलाई दरवाजा जो प्रारंभिक तुर्की कला का एक श्रेष्ठ नमूना है | इसका निर्माण अलाउद्दीन खिलजी द्वारा ही करवाया गया अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में अमीर खुसरो और हसन निजामी जैसे बहुत उच्च कोटि के विद्वान रहते थे | इसके अलावा अलाउद्दीन खिलजी ने सीरी के किले हजार खंभा महल का निर्माण भी कराया |

अंत में अलाउद्दीन खिलजी को हैजा की बीमारी हो गई ,जिससे वह कभी उबर नहीं पाया और 2 जनवरी 1316 को इसकी मृत्यु हो गई थी | अलाउद्दीन खिलजी का मकबरा कुतुब मीनार के परिसर में ही स्थित है।

इमाम जामिन

इमाम जामिन का असली नाम मोहम्मद अली था, जिसे इमाम जामिन के रूप में जाना जाता था | यह 16 शताब्दी का एक इस्लामी मौलवी था | इसकी कब्र भारत में स्थित कुतुब मीनार परिसर में स्थित है इसका निर्माण स्वयं अली ने मुगल सम्राट हुमायूं के शासनकाल के दौरान करवाया था | जब तक उस परिसर में किसी अन्य स्मारक का निर्माण नहीं किया गया था | इमाम जावेद मोहम्मद के सीधे वंश से और उन्हें चिश्ती संप्रदाय से संबंधित माना जाता था | ऐसा कहा जाता है कि सिकंदर लोदी के शासनकाल के दौरान वह तुर्की से दिल्ली चले गए थे और कुतुब मीनार परिसर में स्थित पहली मस्जिद कुवत उल इस्लाम में मुख्य इमाम बन गए थे | हुमायूँ  के शासनकाल में ही उनकी मृत्यु हो गई थी | इसके बाद इन्हें कुतुब मीनार परिसर में ही दफना दिया गया था | जिसे हम इमाम जमीन के मकबरे के नाम से जानते हैं |

इमाम जमीन का मकबरा क्योंकि हुमायूं के शासनकाल में बनाया गया था, इसलिए इसे लोधी स्थापत्य शैली में बनाया गया है | मकबरा चकोर आकार में बनाया गया है, तथा इसकी लंबाई और चौड़ाई 28 फीट मापी गई है | इसे 12 खंभो से जोड़कर एक ऊंची छत के रूप में बनाया गया है | मकबरे के चारों तरफ लाल बलुआ पत्थर के गुंबद बनाए गए हैं |

इस इमारत को अंदर और बाहर से सजाने के लिए संगमरमर का भरपूर इस्तेमाल किया गया है, तथा इसके पश्चिमी हिस्से में मेहराब बना हुआ है | मेहराब का अर्थ होता है वह दिशा जिस तरफ मुस्लिम नमाज़ अदा करते हैं बलूवा पत्थरों से बनाई है | इमारत प्लास्टर से ढका हुआ है जिसका अभी भी एक हिस्सा मौजूद है।

कुवत उल इस्लाम मस्जिद

कुतुब मीनार परिसर मौजूद प्रथम मस्जिद को गुलाम वंश के प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 में शुरू कराया था और इस मस्जिद को बनाने में लगभग 4 वर्षों का समय लगा था | इसके बाद भी इल्तुतमिश और फिरोजशाह तुगलक ने इसके अन्य हिस्सों का निर्माण कराया | इस मस्जिद को 27 हिंदू मंदिरों को जो तोड़ कर बनाया गया था | जिसमें भारतीय और इस्लामिक कलाकृति का नमूना प्राप्त होता है | इस मस्जिद की छत और भारतीय मंदिर शैली की याद दिलाते हैं, लेकिन इसके बुर्ज इस्लामिक शैली में बने हुए हैं | इस मस्जिद के आंगन में इमाम जाम इनका भी मत मकबरा है जिसे मोहम्मद वंश का माना जाता है |

कुतुब मीनार के बारे में अन्य जानकारी

दिल्ली के महरौली में स्थित कुतुब मीनार भारतीय पर्यटन स्थलों में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है |  इसे दास शासक कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया था जो कि इसकी केवल पहली मंजिल का ही निर्माण करा पाया था | बाद में कुतुब मीनार को इल्तुतमिश और अलाउद्दीन खिलजी द्वारा पूरा कराया गया क़ुतुब मीनार लाल बलुआ पत्थरों से बना है, तथा इसकी तीसरी और चौथी मंजिल संगमरमर तथा बलुआ पत्थरों से मिलकर के बनी है | ईटों की बनी यह मीनार विश्व की सबसे ऊंची मीनार है | इस मीनार पर कुरान की आयतें और महीना काशी उकेरी गई है | कुतुब मीनार परिसर में कुतुब मीनार के अलावा अन्य स्मारक और मकबरे भी स्थित हैं जिनका निर्माण अलग-अलग शासनकाल में अलग-अलग शासकों द्वारा करवाया गया था, का नाम कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर ही रखा गया था |

कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुब मीनार बनाने की प्रेरणा अफगानिस्तान में बने जाम मीनार से ली थी

कुतुबमीनार में हुई दुर्घटना

कुतुबमीनार क्योंकि एक ऐतिहासिक मीनार है इसके अंदर लगभग 379 सीढ़ियां है79, जिसमें से केवल 200 सीढ़ियां ही अच्छी स्थिति में है बाकी 179 सीढ़ियों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने बदलने का फैसला किया है |

 ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि इस सेमिनार को मजबूती प्राप्त हो भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार माने तो मीनार के अंदर कुछ पत्थर हल्के अथवा भारी हैं, जिसमें आज से लगभग 40 साल पहले एक बहुत बड़ी दुर्घटना हो गई थी, सन 1980 में कुतुब मीनार के अंदर कुछ स्कूली बच्चों के द्वारा भगदड़ मचने से उनकी मृत्यु हो गई थी | इसी वजह से अब पर्यटकों को को मीनार के अंदर नहीं जाने दिया जाता है।

कुतुब मीनार के बारे में हैरान कर देने वाली कुछ बाते

  • कुतुब मीनार विश्व की सबसे ज्यादा मशहूर ऐतिहासिक स्थलों में से एक है | यहां पर हम आपको कुतुबमीनार से जुड़ी कुछ अनसुनी बातें बताने जा रहे हैं| यदि आप दिल्ली घूमने जाते हैं , तो आपको महरौली स्थित इस मीनार को देखने अवश्य जाना चाहिए |
  •  कुतुबमीनार 73 मीटर ऊंचा है, और आपको इस मीनार की सबसे ऊपर की मंजिल तक पहुंचने के लिए 379 सीढ़ियां चढ़ने पड़ती है |
  • कुतुबमीनार को 12 वीं सदी में आखरी हिंदू साम्राज्य शासन के अंत को खत्म करने के लिए और भारत में पहली मुस्लिम जीत को याद रखने के लिए बनवाया गया था | इसे विक्ट्री टावर या जीत की मीनार भी कहा जाता है |
  • कुतुबमीनार को तीन अलग-अलग मुस्लिम शासकों द्वारा बनवाया गया था | जिसमें कुतुबुद्दीन ऐबक तमीज और फिरोजशाह तुगलक का नाम आता है |
  • कुतुब मीनार परिसर में कुतुब मीनार के अलावा एक मस्जिद और कई मकबरे भी बने हुए हैं |
  • कुतुबमीनार को देखने के लिए आपको ₹10 का टिकट खरीदना पड़ता है |
  • कुतुब मीनार एक ऐसी इमारत है जो16वी शताब्दी के महा भूकंप से बची हुई है, और सातवीं शताब्दी में दो बार बिजली गिरने के बाद भी बची हुई है |
  • 19वीं सदी में कुतुब मीनार में 30 मंजिल को भी जोड़ने की कोशिश की गई थी, जिसे कपोला के नाम से जाना जाता है, और यह मंजिल आज भी कुतुब मीनार पर स्थित है |
  • कुतुब मीनार परिसर में लगभग 2000 साल पुराना एक लोहे का स्तंभ है, जिसे चंद्रगुप्त द्वितीय के द्वारा बनवाया गया था और आज भी इस पर किसी भी प्रकार का जंग नहीं लगा है, ना ही मौसम का कोई प्रभाव पड़ता है |

 कुतुब मीनार के बारे में कुछ रोचक तथ्य

  • कुतुब मीनार का निर्माण 1199 में शुरू हुआ था तथा इसे 1398 में पूरा किया गया |
  • इसे तीन मुस्लिम शासकों द्वारा अलग-अलग वर्षों में बनवाया गया |
  • कुतुब मीनार की ऊंचाई 73 मीटर है और इसका व्यास 15 मीटर है जो कि तल से 2.75 मीटर चौड़ा है |
  • कुतुब मीनार के अंदर गोल सीढ़ियां बनाई गई है, तथा संख्या में यह 379 है |
  • कुतुब मीनार सीधा खड़ा मीनार नहीं है, बल्कि यह एक तरफ से झुका हुआ है भारतीय पुरातत्व विभाग को हर बार इसे सीधा करना पड़ता है |
  • कुतुब मीनार के आसपास के क्षेत्र को कुतुब कंपलेक्स के नाम से जाना जाता है, और यह पूरा क्षेत्र वर्ल्ड हेरिटेज साइट के अंतर्गत आता है |
  • क़ुतुब मीनार पर , अरबी और देवनागरी लिपि में लिखे गए शिलालेख भी मौजूद हैं, जो इस के सुनहरे इतिहास को बयान करते हैं |
  • कुछ लोगों का मानना है, कि कुतुब मीनार कुतुब दिन ऐबक द्वारा बनवाया गया था इसलिए इसका नाम कुतुबमीनार रखा गया है |
  •  इसके अलावा यह भी माना जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक एक सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार का शिष्य था जिसने उसे दीक्षा दी थी, और अपने गुरु की याद में ही कुतुबुद्दीन ऐबक ने अफगानिस्तान की जाम मीनार से प्रेरित होकर के कुतुब मीनार का निर्माण करवाया था |
  • जहां हमने आपको कुतुब मीनार से जुड़ी हुई लगभग हर जानकारी देने की कोशिश की है | इसके अलावा आप हमारी यूट्यूब चैनल मिस्टीरियस कुतुब मीनार पर जाकर के भी कुतुब मीनार से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी को प्राप्त कर सकते हैं |

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